ज्ञान को सहेजने के लिए ह्वेन-त्सांग के शिष्यों ने ऐसे अपनी कु्र्बानी दी

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कुछ समय पढ़ाने के बाद उन्होंने स्वदेश वापस जाने का निश्चय किया। वहां पढ़ाई कर रहे 15 चीनी विद्यार्थियों को जब खबर लगी की ह्वेन-त्सांग वापस चीन जा रहे हैं, तो वे भी उनके साथ हो लिए ताकि सत्संग का अवसर प्राप्त हो। नालंदा में अधययन करते वक्त उन्होंने कुछ ग्रंथों की रचना की थी और सैकड़ों किताबे जमा कर रखी थी। नालंदा से चलते वक्त उन्होंने सारी पुस्तकें अपने साथ ले ली थी। प्रस्थान के लिए एक नौका तय की गई और सभी तय वक्त पर उस पर सवार होकर अपने देश के लिए रवाना हुए। दुर्भाग्य से रास्ते में ह्वेन-त्सांग के दल का सामना भयानक तूफान से हुआ। तूफान में फंसकर नाव हिचकोले खाने लगी। नाव पर सवार सभी लोगों की जान खतरे में पड़ गई। सामने गंभीर संकट देखकर नाविक ने कहा ‘नाव काफी भारी हो गई है और उसका आगे बढ़ना मुश्किल है। चीनी यात्री ह्वेन-त्सांग बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी करने के बाद उसी विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए। विद्या-व्यसनी ह्वेन-त्सांग अपनी मेधा और पढ़ाने की दक्षता के कारण विद्यार्थियों में काफी लोकप्रिय थे।

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